Wednesday, 22 October 2014

दीपावली पूजन की प्रामाणिक विधि



देवी लक्ष्मीजी के पूजन की सामग्री अपनी सामर्थ्य के अनुसार होना चाहिए। इसमें लक्ष्मीजी को कुछ वस्तुएं विशेष प्रिय हैं। उनका उपयोग करने से वे शीघ्र प्रसन्न होती हैं। इनका उपयोग अवश्य करना चाहिए।
वस्त्र में इनका प्रिय वस्त्र लाल, गुलाबी या पीले रंग का रेशमी वस्त्र है। माताजी को पुष्प में कमल व गुलाब प्रिय हैं। फल में श्रीफल, सीताफल, बेर, अनार व सिंघाड़े प्रिय हैं। सुगंध में केवड़ा, गुलाब, चंदन के इत्र का प्रयोग इनकी पूजा में अवश्य करें। अनाज में चावल तथा मिठाई में घर में बनी शुद्धतापूर्ण केसर की मिठाई या हलवा, शिरा का नैवेद्य उपयुक्त है।
प्रकाश के लिए गाय का घी, मूंगफली या तिल्ली का तेल इनको शीघ्र प्रसन्न करता है। अन्य सामग्री में गन्ना, कमल गट्टा, खड़ी हल्दी, बिल्व पत्र, पंचामृत, गंगाजल, ऊन का आसन, रत्न आभूषण, गाय का गोबर, सिंदूर, भोजपत्र का पूजन में उपयोग करना चाहिए।  
चौकी पर लक्ष्मी व गणेश की मूर्तियां इस प्रकार रखें कि उनका मुख पूर्व या पश्चिम में रहे। लक्ष्मीजी, गणेशजी की दाहिनी ओर रहें। पूजनकर्ता मूर्तियों के सामने की तरफ बैठें। कलश को लक्ष्मीजी के पास चावलों पर रखें। नारियल को लाल वस्त्र में इस प्रकार लपेटें कि नारियल का अग्रभाग दिखाई देता रहे व इसे कलश पर रखें। यह कलश वरुण का प्रतीक है।

दो बड़े दीपक रखें। एक में घी भरें व दूसरे में तेल। एक दीपक चौकी के दाईं ओर रखें व दूसरा मूर्तियों के चरणों में। इसके अतिरिक्त एक दीपक गणेशजी के पास रखें।

मूर्तियों वाली चौकी के सामने छोटी चौकी रखकर उस पर लाल वस्त्र बिछाएं। कलश की ओर एक मुट्ठी चावल से लाल वस्त्र पर नवग्रह की प्रतीक नौ ढेरियां बनाएँ। गणेशजी की ओर चावल की सोलह ढेरियां बनाएं। ये सोलह मातृका की प्रतीक हैं। नवग्रह व षोडश मातृका के बीच स्वस्तिक का चिह्न बनाएं। इसके बीच में सुपारी रखें व चारों कोनों पर चावल की ढेरी। सबसे ऊपर बीचोंबीच ॐ लिखें। छोटी चौकी के सामने तीन थाली व जल भरकर कलश रखें।

थालियों की निम्नानुसार व्यवस्था करें-
1. 11 दीपक,
2. खील, बताशे, मिठाई, वस्त्र, आभूषण, चंदन का लेप, सिन्दूर, कुंकुम, सुपारी, पान,
3. फूल, दुर्वा, चावल, लौंग, इलायची, केसर-कपूर, हल्दी-चूने का लेप, सुगंधित पदार्थ, धूप, अगरबत्ती, एक दीपक।

इन थालियों के सामने यजमान बैठे। आपके परिवार के सदस्य आपकी बाईं ओर बैठें। कोई आगंतुक हो तो वह आपके या आपके परिवार के सदस्यों के पीछे बैठे।
चौकी
(1) लक्ष्मी, (2) गणेश, (3-4) मिट्टी के दो बड़े दीपक, (5) कलश, जिस पर नारियल रखें, वरुण, (6) नवग्रह, (7) षोडशमातृकाएं, (8) कोई प्रतीक, (9) बहीखाता, (10) कलम और दवात, (11) नकदी की संदूकची, (12) थालियां, 1, 2, 3, (13) जल का पात्र, (14) यजमान, (15) पुजारी, (16) परिवार के सदस्य, (17) आगंतुक।
पूजा की संक्षिप्त विधि-

सबसे पहले पवित्रीकरण करें। आप हाथ में पूजा के जलपात्र से थोड़ा-सा जल ले लें और अब उसे मूर्तियों के ऊपर छिड़कें। साथ में मंत्र पढ़ें। इस मंत्र और पानी को छिड़ककर आप अपने आपको पूजा की सामग्री को और अपने आसन को भी पवित्र कर लें।

ॐ पवित्रः अपवित्रो वा सर्वावस्थांगतोऽपिवा।
यः स्मरेत्‌ पुण्डरीकाक्षं स वाह्यभ्यन्तर शुचिः॥
पृथ्विति मंत्रस्य मेरुपृष्ठः ग ऋषिः सुतलं छन्दः
कूर्मोदेवता आसने विनियोगः


अब पृथ्वी पर जिस जगह आपने आसन बिछाया है, उस जगह को पवित्र कर लें और मां पृथ्वी को प्रणाम करके मंत्र बोलें-

ॐ पृथ्वी त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता।
त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम्‌॥
पृथिव्यै नमः आधारशक्तये नम


अब आचमन करें
पुष्प, चम्मच या अंजुलि से एक बूंद पानी अपने मुंह में छोड़िए और बोलिए-
ॐ केशवाय नमः
और फिर एक बूंद पानी अपने मुंह में छोड़िए और बोलिए-
ॐ नारायणाय नमः
फिर एक तीसरी बूंद पानी की मुंह में छोड़िए और बोलिए-
ॐ वासुदेवाय नमः
फिर ॐ हृषिकेशाय नमः कहते हुए हाथों को खोलें और अंगूठे के मूल से होंठों को पोंछकर हाथों को धो लें। पुनः तिलक लगाने के बाद प्राणायाम व अंग न्यास आदि करें। आचमन करने से विद्या तत्व, आत्म तत्व और बुद्धि तत्व का शोधन हो जाता है तथा तिलक व अंग न्यास से मनुष्य पूजा के लिए पवित्र हो जाता है।

आचमन आदि के बाद आंखें बंद करके मन को स्थिर कीजिए और तीन बार गहरी सांस लीजिए। यानी प्राणायाम कीजिए क्योंकि भगवान के साकार रूप का ध्यान करने के लिए यह आवश्यक है फिर पूजा के प्रारंभ में स्वस्तिवाचन किया जाता है। उसके लिए हाथ में पुष्प, अक्षत और थोड़ा जल लेकर स्वतिनः इंद्र वेद मंत्रों का उच्चारण करते हुए परम पिता परमात्मा को प्रणाम किया जाता है। फिर पूजा का संकल्प किया जाता है। संकल्प हर एक पूजा में प्रधान होता है। 
 
संकल्प
आप हाथ में अक्षत लें, पुष्प और जल ले लीजिए। कुछ द्रव्य भी ले लीजिए। द्रव्य का अर्थ है कुछ धन। ये सब हाथ में लेकर संकल्प मंत्र को बोलते हुए संकल्प कीजिए कि मैं अमुक व्यक्ति अमुक स्थान व समय पर अमुक देवी-देवता की पूजा करने जा रहा हूं जिससे मुझे शास्त्रोक्त फल प्राप्त हों।

सबसे पहले गणेशजी व गौरी का पूजन कीजिए। उसके बाद वरुण पूजा यानी कलश पूजन करनी चाहिए। हाथ में थोड़ा सा जल ले लीजिए और आह्वान व पूजन मंत्र बोलिए और पूजा सामग्री चढ़ाइए। फिर नवग्रहों का पूजन कीजिए। हाथ में अक्षत और पुष्प ले लीजिए और नवग्रह स्तोत्र बोलिए। इसके बाद भगवती षोडश मातृकाओं का पूजन किया जाता है।

हाथ में गंध, अक्षत, पुष्प ले लीजिए। 16 माताओं को नमस्कार कर लीजिए और पूजा सामग्री चढ़ा दीजिए। 16 माताओं की पूजा के बाद रक्षाबंधन होता है। रक्षाबंधन विधि में मौली लेकर भगवान गणपति पर चढ़ाइए और फिर अपने हाथ में बंधवा लीजिए और तिलक लगा लीजिए। अब आनंदचित्त से निर्भय होकर महालक्ष्मी की पूजा प्रारंभ कीजिए 
सभी भाइयों एवं बहिनों को दीपावली हार्दिक शुभकामनायें
अनिल कुमार शुक्ला 

दीपावली कैसे मनाएँ ? तो पढ़ें


दीवाली पर अगर मां लक्ष्मी को प्रसन्न करना है तो उसके लिये मुहूर्त का खयाल जरूर रखें। क्योंकि मुहूर्त पर पूजन करने से पूजन का ज्यादा लाभ मिल पाता है। हम पहले आपको बतायेंगे कुछ विशेष्ज्ञ मंत्र उसके बाद नीचे आप मुहूर्त पढ़ सकेंगे।
कुछ विशेज्ञ मंत्र
  • विशेष-1: जो लोग कलम-दवात का पूजन करते है। वे निम्न मन्त्र का जाप करें- ऊँ महाकाले नमः ऊँ लेखन्यै नमः।
  • विशेष 2: जो जातक बही-खाता का पूजन करते है। वे निम्न मन्त्र का जाप करें- ऊँ सरस्वत्यै नमः।
  • विशेष 2: जो लोग कूबेर पूजन (तिजोरी-बाक्स) करते हैं। वे इस मन्त्र का जाप करें- कृतेन अनेन पूजनेन कुबेरः प्रीयताम न मम्।
  • विशेष 2: जो जातक तुला, तराजू, कांटा आदि का पूजन करते है। वे इस मन्त्र का जाप करें- ऊँ तुलाय नमः।
  • विशेष 2: जो लोग दीपक का पूजन करते है। वे इस मन्त्र का जाप करें- ऊँ दीपवृक्षाय नमः
दीवापली पूजन के शुभ मुहूर्त
इस वर्ष दीपावली 23 अक्टूबर सन् 2014 को कार्तिक कृष्ण अमावस्या गुरूवार को मनाई जायेगी। इस दिन अमावस्या का पूरे दिन रहेगी। दीपावली पूजन का मुख्य काल प्रदोष काल माना जाता है। इस दिन प्रदोष काल सांय 5:50 मि0 से रात्रि 08:18 मि0 तक हैं।
स्थिर लग्न में पूजन करने वाले लोगों के लिए प्रथम स्थिर लग्न वृष रात्रि 7:10 मि0 से रात्रि 09:13 मि0 तक। दूसरी स्थिर लग्न सिंह अर्धरात्रि के बाद 01:39 मि0 से 03:35 मि0 तक है। महानिशीथ काल रात्रि 22:44 मि0 से रात्रि 01:11 मि0 तक रहेगा।

दीवाली के लिये ढेर सारी खरीददारी आपने कर ली होगी। जाहिर है आपने पूजा की भी सभी तैयारियां कर ली होंगी। लेकिन यह सब आप क्यों कर रहे हैं? जाहिर है लक्ष्मी माता को प्रसन्न करने के लिये। लिहाजा अगर आपके पास लक्ष्मी माता के सवाल का उत्तर है, तभी आपकी दीपावली पूजन को सफल माना जायेगा।
इन सवालों के जवाब हैं तभी दीवाली पर कीजियेगा लक्ष्मी पूजन
जैसा कि हम जानते हैं कि प्राचीन काल से ही देवी लक्ष्मी को मनाने के लिए हर मनुष्य अपने-अपने तरीके से प्रयास करता आ रहा है। भौतिक समाज में रहने वाले हर व्यक्ति को धन की आवश्यकता पड़ती है। संसाधनों के बगैर जीवन को सही ढंग से जीया नहीं जा सकता और संसाधनों को बिना धन के खरीदा नहीं जा सकता। इसलिए दीपो के पर्व दीपावली पर देवी लक्ष्मी का विशेष पूजन व अर्चन करने का विधान है। मां लक्ष्मी की कृपा न धर्म से होती है और न पुण्य से प्राप्त की जा सकती है। यदि आप चाहते है कि देवी लक्ष्मी की कृपा आप पर बनी रहे तो कर्मठशील, कर्तव्यशील, ईमानदार, परोपकारी, पुरूषार्थी, सचरित्र व सदाचार को अपने जीवन का ध्येय बनाना होगा।
कहां होता है लक्ष्मी का निवास का स्थान
देवी लक्ष्मी का निवास स्थान कहां होता है, इस विषय में एक रोचक प्रसंग है। एक बार श्रीकृष्ण और रूक्मणी के समक्ष देवी लक्ष्मी प्रकट हुयी तो देवी रूक्मणी में ने लक्ष्मी जी से पूछा कि देवी आप किन मनुष्यों के वहां निवास करती है और अपनी कृपा बरसाती रहती है।
इन प्रश्नों के जवाब में देवी लक्ष्मी ने कहा अगर मेरे इन सवालों का उत्तर हां में है, तभी मैं आपके घर पधारूंगी।
  • क्या आपके घर में निर्भीक, साहसी, परोपकारी, दयालु व कर्मठ व्यक्त‍ि हैं?
  • क्या आप धर्मज्ञ हैं, बूढ़ों की सेवा करते हैं, मन पर नियन्त्रण करने वाला व क्षमाशील हैं?
  • क्या आपके घर की स्त्रियां सदाचारिणी, धार्मिक व अपने पति की सेवा करने वाली होती हैं?
  • क्या आपके घर की स्त्रियां सदैव सदाचार का पालन करती हैं, सौम्य वेश-भूषा का धारण करती है एंव शुद्ध आचार-विचार का पालन करती है?
  • क्या आप समय का सद्पयोग करते हैं, ब्रहमचर्य का पालन करते हैं, एक नारी व्रत रखते हैं, दूजे को माता-बहन समझते हैं?
  • क्या आपके घर में महिलाओं का सम्मान होता हैं? कहीं आपके घर में रोज-रोज कलह तो नहीं होती?
  • क्या आपके घर में दान दिया जाता है, अतिथियों की सेवा की जाती हो, क्या सभी आपस में एक-दूसरे से प्रेम करते हैं?
अगर इन सवालों के जवाब हां में हैं, तभी आपका लक्ष्मी पूजन सफल होगा, अन्यथा पूजन के लाभ उतने नहीं मिलेंगे जितने की आप कामना कर रहे हैं।